Story of a Sant - एक संत की कहानी - subh sanskar and sanskriti

Sunday, April 7, 2024

Story of a Sant - एक संत की कहानी



एक संत थे जिनका नाम रामदास था वह बहुत ही ज्ञानी और तपस्यवी थे हमेशा ही उनके पास लोगो की भीड़ लगी रहती थी क्योंकि अगर कोई भी व्यक्ति उनके पास अपनी समस्या लेकर आता तो संत रामदास उनकी समस्याओं का बहुत ही सरल तरीके से समाधान करते थे जिससे लोग अपनी समस्याओ का समाधान पाकर काफी ख़ुश और संतुस्ट होते और इसके बदले में लोग उनको धन और दौलत देकर जाते

 लेकिन रामदास जी एक संत थे भला एक संत पैसो का क्या करते उन्होंने काफी दिनों तक विचार किया और बाद में ये फैसला किया की वो इन धन दौलत को लोगो के कल्याण करने में खर्च करेंगे संत रामदास का एक शिष्य था जिसका नाम सुखी चंद्र था वह हमेशा संत के साथ रहता और उनकी सेवा में लगा रहता था संत को भी सुखी चंद्र पर पूरा भरोसा था इसलिए उन्होंने एक दिन सुखी चंद्र को बुलाया और कहा बेटा मैंने एक फैसला किया हैं मेरे पास जो भी धन और दौलत है मैं उसे लोगो के कल्याण में जैसे की गरीबो की शिक्षा के लिये स्कूल और उनकी बीमारी का इलाज करने के लिये अस्पताल और भी कई नेक कामों में इस धन को खर्च करना चाहता हूँ 

ये बात सुनकर सुखी चंद्र ने सुनकर कहा गुरु जी जैसी आप की इच्छा आप जैसा चाहते हैं मैं वैसा ही करूँगा और तब संत रामदास जी ने कहा बेटा पास के कमरे में एक अलमारी हैं तुम मेरे सबसे अच्छे शिष्या हो मुझे सिर्फ तुम पर भरोसा हैं मुझे उस अलमारी के पास ले चलो ये बात सुनकर सुखी चंद्र अपने गुरु के साथ पास वाले कमरे में गया जैसे ही संत रामदास जी ने अलमारी खोली

 ये देखकर सुखी चंद्र को बड़ा ही आश्चर्य हुआ की गुरु के पास तो बहुत ही धन हैं दोस्तों धन में कई गुण पाये जाते हैं जिनमें से एक गुण है छल और अब यही गुण सुखी चंद्र में आ गया अब रात और दिन सुखी चंद्र उस धन के बारे में सोचने लगा और उस धन को कैसे प्राप्त कर सके इसी के बारे में सोचने लगा कई दिन बीत गये और एक दिन संत रामदास कुछ जरूरी काम से कुछ दिनों के लिये बाहर जा रहे थे 





थोड़ा जल्दी जाने के चक्कर में आलमारी की चाभी वो साथ ले जाना भूल गये और तभी सुखी चंद्र को मौका मिला और उसने आलमारी से सारा धन निकाल लिया और वहा से बिना किसी को कुछ बताये वहा से चला गया कुछ दिनों बाद जब रामदास जी वापस आये तो सुखी चंद्र को वहा पर नही पाकर उन्हे शक हुआ और वो जहां पर आलमारी की चाभी रखते थे वहा पर गये और जाकर देखा तो चाभी वही पर थी अब उन्हे ऐसा लगा की हो सकता है सुखी चंद्र अपने घर गया होगा 

और जब कुछ दिन बीत गये फिर भी सुखी चंद्र नही लौटा अब संत जी को चिंता हुई ऐसा क्या हो गया जो मेरा सबसे प्रिय शिष्य मुझे छोड़कर चला गया एक दिन संत जी के एक और शिष्य की तबियत खराब हो गयी अब संत जी को पैसा की आवश्यकता पडी क्योंकि शिष्य का इलाज कराना था अब संत आलमारी की चाभी लेकर उस कमरे में गये जहा आलमारी रखी थी और जैसे ही आलमारी खोली उन्होंने देखा आलमारी बिलकुल खाली थी 

उन्हे इस बात का बड़ा ही दुख हुआ की उनके सबसे प्रिय शिष्य ने उनको इतना बड़ा धोखा दिया और उन्होंने अपने दुखी मन से सुखी चंद्र को श्राप दिया की जिस धन  को पाने के लिया उसने इतना बड़ा धोखा दिया वो शीघ्र ही उसे खो देगा और फिर उन्होंने अपने प्राण को त्याग दिया अब ये बात सुखी चंद्र को पता लगी मन ही मन सुखी चंद्र बहुत ही खुश हुआ क्योंकि उसके पास बहुत ही धन था

 दोस्तों धन की भूख कभी खत्म नही होती क्योंकि मनुष्य जितना ही धन अर्जित करता है उतना ही उसकी भूख बढ़ती है कुछ दिन बीत गये सुखी चंद्र की शादी हो गयी और कुछ सालो बाद उनके घर एक बच्चे का जन्म हुआ सब कुछ अच्छा चल रहा था अब उनका बेटा बड़ा हो गया लेकिन छल से कमाया गया धन ज्यादा दिन तक चलता नही हैं और धीरे धीरे अब उनके बेटे का स्वास्थ ख़राब होने लगा अब सुखी चंद्र को इस बात की चिंता होने लगी की उनके बेटे की तबियत ठीक नही हो रही हैं

 अब धीरे धीरे उनका धन सिर्फ अपने बच्चे की दवाई में खर्च होने लगा और एक दिन ऐसा आया की सुखी चंद्र ने अपना बेटा खो दिया और साथ में अपना सारा धन अब उन्हे इस बात का एहसास हुआ की उनके द्वारा किया गया अपराध ही उनके लिये कष्ट का कारण बन गया और एक दिन ऐसा आया की उनकी मृत्यु हो गयी 

छल से कमाया गया धन सिर्फ आपके साथ छल ही करेगा 

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